Arya Samaj Mandir in Rajinder Nagar Delhi

आर्य समाज मंदिर, राजिंदर नगर के आदरणीय आचार्यजी (पंडितजी)

Respected Acharyaji (Panditji) of Arya Samaj Mandir, Rajinder Nagar

आर्य समाज मंदिर ,राजिंदर नगर

1948 में स्थापित, आर्य समाज राजिंदर नगर, नई दिल्ली वैदिक ज्ञान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का एक प्रमुख केंद्र रहा है। विभाजन के बाद धैर्य और पुनर्निर्माण की भावना से जन्मा यह स्थान एकता, शिक्षा और आध्यात्मिक उन्नति को प्रोत्साहित करता है।
नियमित सत्संग, यज्ञ और सामुदायिक पहलों के माध्यम से हम युवाओं, महिलाओं और वंचित वर्गों को सशक्त बनाते हैं।

हम केवल अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुधार को बढ़ावा देने में विश्वास करते हैं। हर चुनौती में हमारा समाज करुणा और कर्म के साथ एकजुट खड़ा रहा है। आज हम गर्व के साथ इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं — शाश्वत मूल्यों को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ते हुए।

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आर्य समाज राजिंदर नगर एवं नई दिल्ली की शाखाएँ

आर्य समाज राजिंदर नगर

आर्य स्त्री समाज

आर्य महिला आश्रम

प्रशंसापत्र

Blogs

  • Arya Samaj Mandir: A Center of Faith, Knowledge, and Social Reform
  • The 16 Vedic Sanskars: A Journey Through Life’s Sacred Milestones
  • Vedic Marriage Ceremony – Arya Samaj Rituals

महर्षि दयानंद जी के विचार के विचार

आर्य समाज

Arya Samaj Mandir for Namkaran Sanskar in Rajinder Nagar Delhi

महर्षि दयानन्द ने एक नए पुनर्जागरण युग की शुरुआत की। वे लाखों लोगों के लिए आशा की किरण बने। उनका सपना था कि उनके द्वारा प्रारंभ किया गया कार्य उनके बाद भी निरंतर चलता रहे और उनके सपने साकार हों। इसी उद्देश्य से उन्होंने सन् 1875 में बम्बई (मुंबई) में आर्य समाज की औपचारिक स्थापना की।

आर्य समाज कोई नया धर्म या संप्रदाय नहीं है, बल्कि एक सुधार आंदोलन और सामाजिक-धार्मिक संगठन है। इसका उद्देश्य लोगों को अंधविश्वास और अवैदिक मान्यताओं से दूर करके उन्हें वेदों की ओर वापस ले जाना है। आर्य समाज शुद्ध और प्राचीन मानव धर्म अर्थात सनातन वैदिक धर्म की ओर लौटने का आह्वान करता है।

आर्य समाज जीवन जीने का आध्यात्मिक मार्ग है, जो शांति और कल्याण का सार्वभौमिक संदेश देता है। इसके दस नियम वेदों पर आधारित सिद्धांतों पर स्थापित हैं, जिनका लक्ष्य संसार को एक बेहतर स्थान बनाना है। आर्य समाज सच्चे वैदिक संस्कृति और राष्ट्रीय भावना को बढ़ावा देता है तथा देश के प्रति गर्व और देशभक्ति की भावना जागृत करता है।

महर्षि दयानन्द का प्रिय वेद मंत्र
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ओ३म् विश्वानि देव सवितुः दुरितानि परा सुव। यद् भद्रं तन्नः आ सुव॥

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 (यजुर्वेद 30|3)
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महर्षि दयानन्द का हस्ताक्षर

सत्यार्थ प्रकाश

सत्यार्थ प्रकाश महर्षि दयानन्द का महान ग्रंथ है। इसमें महर्षि दयानन्द की धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक, राजनीतिक और नैतिक विषयों पर शिक्षाओं का संकलन है। यह ब्रह्मा से लेकर जैमिनी तक ऋषियों द्वारा प्रतिपादित वैदिक विचारों का सार प्रस्तुत करता है।

सत्यार्थ प्रकाश का मुख्य उद्देश्य सत्य और असत्य का वास्तविक स्वरूप मनुष्यों के समक्ष रखना है, ताकि वे अपने हित-अहित को समझ सकें और असत्य का त्याग कर सत्य को अपनाकर सुखी जीवन व्यतीत कर सकें। इस ग्रंथ में महर्षि दयानन्द ने सनातन वैदिक धर्म का स्वरूप स्पष्ट किया है तथा उस समय प्रचलित विभिन्न संप्रदायों का निष्पक्ष और तार्किक विवेचन भी प्रस्तुत किया है, बिना किसी भेदभाव के।

वास्तव में यह ग्रंथ एक प्रकाशस्तंभ है, जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर, अविवेक से विवेक की ओर, अधर्म से धर्म की ओर और अज्ञान से विज्ञान की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शक है।

श्रद्धांजलि

महर्षि दयानंद के प्रमुख अनुयायी